Farrukhabad news फर्रुखाबाद / उत्तर प्रदेश
प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित नई नीतियों को लेकर शिक्षकों के बीच असंतोष उभरता दिखाई दे रहा है। सेवा में कार्यरत शिक्षकों के लिए बार-बार परीक्षा अनिवार्य किए जाने की संभावित व्यवस्था पर उत्तर प्रदेशीय शिक्षक संघ, फर्रुखाबाद के जिला महामंत्री राज किशोर शुक्ला ने गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे अव्यवहारिक और विडंबनापूर्ण बताते हुए सरकार से पुनर्विचार की मांग की है।
राज किशोर शुक्ला का कहना है कि देश में अनेक महत्वपूर्ण कार्य सीमित प्रशिक्षण के आधार पर सफलतापूर्वक संपन्न हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ दिनों के प्रशिक्षण के बाद विशाल स्तर पर जनगणना कर ली जाती है और चुनाव जैसे बड़े लोकतांत्रिक आयोजन भी कुशलतापूर्वक संपन्न हो जाते हैं। इसके विपरीत, एक शिक्षक जो वर्षों से निरंतर अध्यापन कर रहा है और समाज निर्माण में अहम भूमिका निभा रहा है, उसे अपने पद पर बने रहने के लिए बार-बार परीक्षा देने के लिए बाध्य किया जाना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दशकों का अनुभव, समर्पण और शिक्षण कार्य अब अप्रासंगिक हो गया है? यदि ऐसा नहीं है, तो केवल लिखित परीक्षा को ही योग्यता का आधार क्यों बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, यह व्यवस्था शिक्षकों के आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाती है, क्योंकि शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य का निर्माता होता है। शुक्ला ने यह भी कहा कि शिक्षकों के मूल्यांकन के लिए एक संतुलित और व्यवहारिक प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जिसमें अनुभव, कार्यकुशलता और प्रशिक्षण को समान महत्व मिले। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार की नीतियां लागू की गईं, तो इससे शिक्षकों का मनोबल प्रभावित होगा और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस मुद्दे पर कई बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने भी अपनी राय व्यक्त की। उनका कहना है कि यदि सेवा में बने रहने या पदोन्नति के लिए परीक्षा अनिवार्य की जा रही है, तो क्या न्यायपालिका के न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी (आईएएस, पीसीएस) या अन्य विभागों के अधिकारी भी इसी प्रक्रिया के लिए तैयार हैं? इसी प्रकार, क्या जनप्रतिनिधि—विधायक या सांसद—चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनने के लिए पुनः परीक्षा देने को तैयार होंगे?
बुद्धिजीवियों का तर्क है कि यदि अन्य क्षेत्रों में अनुभव और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी जाती है, तो शिक्षकों पर ही इस प्रकार का “एकतरफा नियम” लागू करना उचित नहीं कहा जा सकता। उन्होंने मांग की कि शिक्षा नीति बनाते समय शिक्षकों की गरिमा, अनुभव और व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए, ताकि व्यवस्था संतुलित और न्यायसंगत बन सके।
ब्यूरो रिपोर्ट :-जयपालसिंह यादव / दानिश खान

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