Farrukhabad news दिल्ली सल्तनत की राजधानी से मुगलों के रणक्षेत्र तक: 2500 साल का सीना ताने खामोश खड़ा है फर्रुखाबाद का शमशाबाद

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Farrukhabd news गंगा किनारे दफन हैं सल्तनत के कई राज, राजा खोर के किले से लेकर ‘गंज-ए-शहीदां’ की दास्तान; कभी इस कस्बे से चलता था हिंदुस्तान का तख्त-ओ-ताज

विशेष पड़ताल (शमशाबाद से महेश वर्मा)

​गंगा की लहरों के किनारे सुस्ताता फर्रुखाबाद का शमशाबाद कस्बा पहली नजर में आपको एक आम देहाती बाजार लग सकता है, लेकिन इसके टीलों के नीचे 2500 साल पुराना एक ऐसा दहकता इतिहास दबा है, जो सीधे दिल्ली के तख्त से टकराता है। यह वही सरजमीं है जिसने दिल्ली सल्तनत को अपनी बाहों में पनाह दी और जब दिल्ली पानी की एक-एक बूंद को तरसी, तो शमशाबाद ही हिंदुस्तान की अस्थायी राजधानी बनकर उभरा।

टीलों में दफन 2500 साल पुरानी सभ्यता

पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहाँ मिले ‘उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भांड’ (NBPW) और ईसा पूर्व के दुर्लभ सिक्के साफ गवाही दे रहे हैं कि जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कबीलों में भटक रहा था, तब ईसा से 500 साल पहले शमशाबाद एक चमचमाता, विकसित शहर था।

‘खोर नगर’ से ‘शमशाबाद’ बनने की दास्तान

इतिहास के पन्नों (तारीख-ए-फिरोजशाही) को खंगालें तो इसका मूल नाम ‘खोर नगर’ था। 9वीं से 12वीं सदी के बीच प्रतिहारों और कन्नौज के गहड़वालों का यह प्रमुख गढ़ रहा:

  • राजा खोर का किला: शिवभक्त राजा खोर ने ऊंचे टीले पर एक अभेद्य दुर्ग बनवाया था।
  • 800 साल पुराना चौमुखी शिव मंदिर: कन्नौज के हर्षकालीन गौरीशंकर मंदिर की टक्कर का यह मंदिर आज भी राजा खोर के वैभव और आस्था की जीती-जागती मिसाल है।
  • सल्तनत का नया नाम: गुलाम वंश के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के रसूख और सम्मान में आगे चलकर खोर नगर का नाम ‘शमसाबाद’ पड़ा।

जब दिल्ली प्यासी मरी, तब शमशाबाद बना देश की राजधानी

गंगा के सामरिक किनारे पर स्थित इस कस्बे का सियासी वजन उस दौर में दिल्ली से कम नहीं था। इतिहास का सबसे चौंकाने वाला अध्याय तब लिखा गया, जब दिल्ली में भीषण जल संकट पैदा हुआ। प्यास से हलकान सुल्तान ने अपना पूरा तामझाम समेटा और शमशाबाद को दिल्ली सल्तनत की अस्थायी राजधानी घोषित कर दिया। महीनों तक देश की नीतियां इसी कस्बे से तय हुईं।

खूनी जंग और ‘गंज-ए-शहीदां’ की गूंज

शमशाबाद ने सत्ता के लिए भयानक कत्लेआम भी देखा है:

  • शहीदों की बस्ती: लोधी हुक्मरानों और जौनपुर के शर्की सुल्तानों के बीच यहाँ भीषण युद्ध हुए। हजारों जांबाजों के लहू से लाल हुई इस जमीन पर जब कब्रें बनीं, तो इसे ‘गंज-ए-शहीदां’ (शहीदों का शहर) कहा जाने लगा।
  • सिकंदर लोदी की छावनी: खिज्र खान और सिकंदर लोदी की फौजों ने यहीं डेरा डाला था। सिकंदर की वही फौजी छावनी आज ‘सिकंदरपुर महमूद’ के नाम से जानी जाती है।

मुगलों की सियासत और पलायन का गवाह

  • बाबर का फरमान: 1528 में मुगल बादशाह बाबर ने विक्रमजीत सिसोदिया को यहाँ की कमान सौंपकर गवर्नर बनाया।
  • हुमायूं का गुप्त रास्ता: चौसा और बिलग्राम में शेरशाह सूरी से मात खाकर जान बचाते हुए हुमायूं शमशाबाद के गुप्त रास्तों से ही दिल्ली की ओर भागा था।
  • अकबर का दामोदरपुर: अकबर के दौर में कन्नौज सरकार के तहत यह बड़ा परगना बना। तत्कालीन सैन्य अधिकारी मिर्जा ताहिर और राय दामोदर दास का असर आज भी पास के ‘अकबरपुर दामोदर’ गांव में देखा जा सकता है।

उपेक्षित धरोहर, सरकारी नजरों की दरकार

स्थानीय इतिहासकारों की मानें तो शमशाबाद की हवा में आज भी हिंदुस्तान का अनछुआ इतिहास तैर रहा है। दिल्ली की गद्दी को शरण देने वाली यह ऐतिहासिक नगरी आज प्रशासन की बेरुखी और सरकारी संरक्षण के अभाव में गुमनामी के आंसू बहा रही है। अगर वक्त रहते इन प्राचीन टीलों और धरोहरों का संरक्षण नहीं हुआ, तो आने वाली नस्लें हिंदुस्तान के इस गौरवशाली अध्याय को सिर्फ किस्से-कहानियों में ही ढूंढ़ पाएंगी।

ब्यूरो चीफ जयपाल सिंह यादव दानिश खान

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