KAIMGANJ NEWS सिस्टम को अल्टीमेटम: ‘खैरात नहीं, हक चाहिए’—कायमगंज में आशाओं की बगावत से हिला स्वास्थ्य महकमा

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KAIMGANJ NEWS –छठे दिन फूटा सब्र का बांध: ‘रात-बिरात हम दौड़ें और सरकार हमें चिल्लर थमाए, अब यह गुलामी नहीं चलेगी!’

  • ​15 तक सांकेतिक हड़ताल, नहीं चेते अफसर तो लखनऊ तक गूंजेगा शंखनाद

​कायमगंज (फर्रुखाबाद)।

जब पसीने की पाई-पाई के लिए व्यवस्था गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दे, तो खामोश हाथ भी मुट्ठियां बांधना सीख जाते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की चौखट पर पिछले छह दिनों से यही मंजर है। सरकारी कागजों में ‘स्वास्थ्य दूत’ का तमगा ओढ़ने वाली आशा और संगिनियों ने अब दो टूक लहजे में बगावत का बिगुल फूंक दिया है। सोमवार को धरने के छठे दिन अस्पताल परिसर नारों की तल्खी से थर्रा उठा। तपती जमीन पर बैठी महिलाओं के तेवर साफ बता रहे हैं कि इस बार जंग आर-पार की है—या तो वाजिब हक मिलेगा, या फिर स्वास्थ्य तंत्र को घुटनों पर आना पड़ेगा।

​“साहब एसी में फरमान सुनाते हैं, हम कीचड़ में जान दांव पर लगाते हैं”

धरनास्थल पर गरजते हुए ब्लॉक अध्यक्ष शिप्रा सक्सेना ने सत्ता और अफसरों की संवेदनहीनता की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने कहा, “गांव के अंतिम छोर पर आधी रात को किसी जच्चा की चीख उठे, तो कोई डॉक्टर या बड़ा बाबू नहीं पहुंचता; जान हथेली पर रखकर हम पगडंडियों पर दौड़ती हैं। कोरोना जैसी महामारी में जब दुनिया घरों में दुबकी थी, तब हम मौत से टकराई थीं। मगर बदले में क्या मिला? पेट काटती महंगाई में चंद सिक्कों की भीख! सरकार हमसे अफसरों वाला काम चाहती है और भुगतान बंधुआ मजदूर से भी बदतर देती है। यह सीधा-सीधा सरकारी शोषण है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

​15 अक्टूबर तक ताला, फिर होगा बड़ा धमाका

संगठन ने साफ लफ्जों में चेता दिया है कि 1 से 15 अक्टूबर तक की यह कलमबंद हड़ताल सिर्फ पहली चेतावनी है। कार्यकत्रियों ने सीएचसी अधीक्षक को ज्ञापन नहीं, बल्कि हुकूमत के नाम खुला अल्टीमेटम थमाया है। मंच से दो-टूक कहा गया कि यदि 15 तारीख की शाम तक मानदेय बढ़ोतरी का लिखित शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो यह आंदोलन अस्पताल के गेट से निकलकर सड़कों पर उतरेगा और पूरे जिले का चक्का जाम कर दिया जाएगा।

​धराशायी हुआ देहात का हेल्थ मॉडल

छह दिन की हड़ताल ने ही स्वास्थ्य विभाग के दावों की हवा निकाल दी है। ग्रामीण अंचलों में नवजातों का टीकाकरण पूरी तरह ठप पड़ चुका है। संस्थागत प्रसव की जानकारी जुटाने वाला कोई नहीं है और गरीब तीमारदार अस्पतालों में लाचार भटक रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि जनता की इस दुर्दशा के असली गुनहगार वे अफसर हैं जो कुर्सियों पर बैठकर आंखें मूंदे तमाशा देख रहे हैं।

​मैदान-ए-जंग में डटीं सैकड़ों वीरांगनाएं

धरने में गंगोत्री, करिश्मा, सुनीता, शीतला, रीमा, रंजना देवी, रामकुमारी समेत सैकड़ों कार्यकत्रियों ने ताल ठोकते हुए कसम खाई कि जब तक खाते में वाजिब दाम नहीं, तब तक गांव में कोई काम नहीं।

​अफसरों के चेहरे की हवाइयां बता रही हैं कि यह चिंगारी अब बड़ा बवंडर बनने को तैयार है; देखना यह है कि बहरे सिस्टम के कान कब खुलते हैं।

ब्यूरो चीफ जयपाल सिंह यादव दानिश खान

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