KAIMGANJ NEWS –गोदाम बने ‘तालाब’, करोड़ों की पूंजी खाक; चोक पड़े नालों ने खोला बर्बादी का रास्ता, अफसरों के सामने फूटा जनता का आक्रोश
कायमगंज (फर्रुखाबाद):
कुदरत के बेरहम तेवर और नगर पालिका व प्रशासनिक अमले की आंख मूंदने की फितरत ने कायमगंज को बर्बादी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। पिछले 65 घंटों में आसमान से बरसी आफत ने ऐसा खौफनाक मंजर पेश किया कि पितौरा और कुबेरपुर के मोहल्ले कंक्रीट के जंगल से सीधे उफनते दरिया में तब्दील हो गए। सैलाब की तेज धार ने जब रिहायशी इलाकों का रुख किया, तो दो सौ से ज्यादा घरों के चूल्हे ठंडे पड़ गए। मगर सबसे बड़ा जख्म उन व्यापारियों के सीने पर लगा है, जिनकी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई गोदामों में भरे 8 फीट गंदे पानी के नीचे दम तोड़ गई।

बर्बादी इतनी खौफनाक है कि इलाके में करोड़ों रुपये के नुकसान का अनुमान है और ग्राउंड जीरो पर सिसकियों के साथ सिस्टम के खिलाफ बारूद जैसा गुस्सा उबल रहा है।वही सपा नेता मरिया असलम अपने कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुंची इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से समस्या का समाधान करने की बात कही । काफी देर तक नोकझोक होती रही। इस कोहराम की असल जड़ केवल बादलों का फटना नहीं, बल्कि नगर पालिका और संबंधित विभागों की महीनों की घोर अनदेखी है। स्थानीय बाशिंदों के अनुसार, मुख्य नाला महीनों से सिल्ट, मलबे और प्लास्टिक कचरे से चोक पड़ा था। सफाई के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए गए। नतीजा यह हुआ कि जैसे ही आसमानी पानी गिरा, नाले ने दम तोड़ दिया और निकासी के बजाय उलटे वेग से पानी रिहायशी इलाकों और गोदामों में तबाही बनकर घुस गया। सुबह होते ही गुस्साए सैकड़ों व्यापारी और स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए। प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और माहौल तनावपूर्ण हो गया।

8 फीट पानी में डूबा ‘फर्नीचर का साम्राज्य’, एक झटके में एक करोड़ स्वाहा
सैलाब की सबसे दर्दनाक मार गढ़ी के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पड़ी है। व्यापारियों के आलीशान गोदाम देखते ही देखते विशालकाय हौज बन गए। इलाके के प्रमुख व्यापारी ‘शाहिद फर्नीचर’ की दास्तान सुनकर हर कोई सन्न रह गया। उनके गोदाम में पानी का स्तर करीब 8 फीट तक पहुंच गया था। प्लाईवुड, महंगी सनमाइका, डिजाइनर बोर्ड और तैयार फर्नीचर सब कुछ पानी में तैरते नजर आए।
व्यापारी शाहिद ने भर्राए गले से बताया, “सालों की खून-पसीने की कमाई कुछ ही घंटों में तबाह हो गई। करीब एक करोड़ रुपये का माल पानी में गलकर कबाड़ बन चुका है। अब हमारे सामने सिर्फ अंधेरा है।” यही हाल अन्य दर्जनों लोगों का है, सामान पानी की भेंट चढ़ चुका है। संकट की इस घड़ी में पितौरा के ग्राम प्रधान प्रतिनिधि अनिल कुमार सिंह ने हालात बेकाबू होते देख खुद मोर्चा संभाला। प्रशासन की सुस्ती के बीच उन्होंने निजी संसाधनों को झोंक दिया। रात के अंधेरे दिन के उजाले में जेसीबी, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और भारी-भरकम सबमर्सिबल मोटरों को पानी निकालने के काम पर लगाया गया। अनिल कुमार सिंह अपनी टीम के साथ कमर तक पानी में उतरकर लोगों को सुरक्षित निकालने और पानी का रुख मोड़ने की जुगत में पूरी रात और दिन पसीना बहाते रहे। हालांकि पानी का दबाव इतना विकराल था कि दर्जनों बस्तियां दोपहर तक पानी के पहरे में ही कैद रहीं।
बैकफुट पर अफसर, व्यापारियों ने दी खुली चेतावनी
इलाके में भारी बवाल और हाहाकार की गूंज जब तहसील मुख्यालय तक पहुंची, तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में तहसीलदार अभिषेक कुमार, क्षेत्रीय लेखपाल आशीष और नगर पालिका प्रशासन की तकनीकी टीम लाव-लश्कर के साथ ग्राउंड जीरो पर पहुंची। घुटनों तक भरे पानी से गुजरते हुए अफसरों ने बर्बादी का मंजर देखा।
इस दौरान पीड़ित व्यापारियों का सब्र टूट गया और उन्होंने अफसरों को घेर लिया। आक्रोशित व्यापारियों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी: “कागजी कार्रवाई छोड़िए, चोक नाले को युद्धस्तर पर तुरंत साफ कराइए। अगर अगली बारिश से पहले जल निकासी का पुख्ता इंतजाम नहीं हुआ, तो पूरा इलाका जलसमाधि ले लेगा और इसकी जिम्मेदारी सीधे प्रशासन की होगी।” व्यापारियों ने शासन से मांग की है कि किसी निष्पक्ष एजेंसी से डूबे माल का पारदर्शी सर्वे कराया जाए और तुरंत आर्थिक मुआवजे का ऐलान कर भुखमरी की कगार पर पहुंचे कारोबारियों को राहत दी जाए।
इनसेट: बर्बादी के बीच ‘मछली लूट’ का अजीब तमाशा, बाल्टी-जाल लेकर उमड़े सैकड़ों लोग
जहाँ एक तरफ व्यापारी अपनी जलमग्न पूंजी देखकर छाती पीट रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पितौरा में एक अजीबोगरीब नजारा भी देखने को मिला। इलाके में रहने वाले बली खान का एक बड़ा निजी मछली पालन तालाब है। मूसलाधार बारिश के चलते यह तालाब पूरी तरह ओवरफ्लो हो गया और उसकी दीवारें लांघकर हजारों की तादाद में मछलियां सड़कों, खेतों और उफनते नालों में फैल गईं।
जैसे ही यह खबर फैली, आसपास के गांवों से बच्चों, जवानों और बुजुर्गों का हुजूम उमड़ पड़ा। लोग हाथ में जाल, बाल्टी, गमछा और जो बर्तन हाथ लगा, उसे लेकर पानी में कूद पड़े। दिन भर घुटनों तक भरे पानी में ‘मछली पकड़ने का महा-अभियान’ चलता रहा। किसी के चेहरे पर मुफ्त की मछली मिलने की खुशी थी, तो ठीक चंद कदम की दूरी पर जिंदगी भर की पूंजी गंवा चुके व्यापारियों का मातम पसरा हुआ था—कुदरत की इस मार ने एक ही जगह पर खुशी और बर्बादी की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें दिखा दीं।
रिपोर्ट: जयपाल सिंह यादव (ब्यूरो चीफ) / दानिश खान

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